"मैं कुदरत "
हर जीव मैं बसा हूँ मैं,
कण -कण से बना हूँ मैं,
हर मोड़ पे सज़ा हूँ मैं,
अनेक रंगों से रंगा हूँ मैं,
हर पल कहीं न कहीं,
करवट बदलता हूँ मैं,
मैं कुदरत .........
चमकती हुई किरणों से मेरी,
बदलू सप्तरंग पल पल,
कहीं उदय कहीं अस्त मेरा,
मैं कुदरत..........
बदलू जो मिज़ाज,
बदल जाये मौसम,
अंगड़ाई जो लू,
बन जाये पतझड़, बसंत बहार,
बरसाऊ आग के गोले,
बनके गरम ग्रीष्म,
लहराऊ जो शीत हवा बनकर,
बन जाये शरद,
तृप्त करु धरती को,
बनके बरसात,
हर जीव को जीवन बख्श़ु,
मैं कुदरत.........
अनगिनत रंगों से,
अनगिनत आकार से,
अनगिनत जीव से,
अनगिनत स्वरूप मैं,
बनाया मैंने समस्त ब्रह्मांड को...
पक्षी बनकर मधुर स्वर सुनाऊं,
फूल बनकर धरती को सजाऊं, महकाऊ,
मौज़ बनकर दौडू दरिया मैं,
पवन बनकर फसलों को लहराऊ,
बर्फ की चादर बनकर पहाड़ों को सजाऊं,
रेत के कणों से रेगिस्तान बनाऊं,
अंबर को सजाऊं समस्त तारामण्डल से
लुक्का छुपी खेलु बादल संग,
बिजली बनकर गरजू आसमान से,
आंधी -तूफान बनकर कहर बरसाऊ
हवा,जल, अन्न बनकर जीने का स्त्रोत बनू...
मैं कुदरत......
सैंकड़ो सालों से अस्तित्व मेरा,
फिरभी रोज नया सा लगता हूँ मैं,
मन नहीं भरेगा मेरे दीदार से,
रोज नई ऊर्जा जो बख्श़ता हूँ मैं,
मैं कुदरत........
समय,सीमा, सौंदर्य,
कभी, कहीं भी न रहा मेरा स्थिर,
चाहूं मैं अगर,
धरती से सोना उगलु,
धरती पे जन्नत बनाऊं,
न चाहूं,
धरती चीर लावा उगलु,
कंपन से मेरी तबाही मचाऊ,
मत कर खिलवाड़ मुझसे ए इंसान,
विधाता भी मैं और विनाशकर्ता भी मैं
" चाहत " अगर हो दिल मैं,
हर पल महसूस होता हूँ मैं,
" नज़रिया " जरूर देखना मुझे,
हर जगह मौजूद हूँ मैं,
" मैं कुदरत "....मनीष

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