"चंद्रमा"
लहराई शीतलता, बिखरी हर जगह रोशनी, निखरी सुंदरता तारों बादलो संग,
बना परिपूर्ण सोलह कलाओं के संग,
नील गगन से अमृत बरसाए उजला उजला चांद...
चांदनी फैलाई सारे जहां में,
परिवर्तित करके सूर्य प्रकाश को,
फीका लगे रंग दुजा,
चमकती रोशनी के आगे तेरी,
नील गगन से अमृत बरसाए उजला उजला चांद...
लुक्का छुपी खुब भाए सबको, बादलो संग तेरी,
कभी पूरा,कभी आधा,कभी अधुरा,
पूर्णिमा से अमावस और अमावस से पूर्णिमा तक, घटती बढ़ती आकृतियों ने "चंद्रकला" सजायी गगन में,
नील गगन से अमृत बरसाए उजला उजला चांद.....
हर अंदाजमें निखरा रूप तेरा अनेरा,
हर दीदारमें सबने पाया तुजे अलग अलग,
एक प्रेमी ने तुझमें "चौदवी का चांद" पाया,
एक मां ने तुझमें अपने प्यारे "बेटे" को पाया,
बच्चों ने तुझमें अपने प्यारे "चंदामामा" को पाया,
एक खगोलशास्त्री ने तुझमें अपनी "खोज" को चाहा,
एक पतिव्रता ने व्रत तोडा "दिदार" कर तेरा,
एक कवि ने तेरा हर "रुप" निखारना चाहा,
नील गगन से अमृत बरसाए उजला उजला चांद.....
खीर खाए सब अमरत्व पाने को,
जैसे "माँ" शब्दमें समाकर अमृत जो बरसाया,
वृंदावन में मची धूम आज,
श्रीकृष्ण खेले दिव्य महारासलीला व्रज गोपिकाओं के संग,
नील गगन से अमृत बरसाए उजला उजला उजला....
"चंद्रमा" मेरी नजर से....
