कहीं नफरत की जंग, कहीं अपना दबदबा बनाने की जंग, कहीं कुछ हासिल करने की जंग, कहीं देश रक्षा की जंग, कहीं एक दूसरे से आगे निकलने की जंग, कहीं कूटनीति से जीतने की जंग, तो कहीं अपना व्यापार बढ़ाने की जंग...
"क्या किसने पाया, क्या किसने खोया"
तबाही का मंजर बनी हर वक्त ये जंग...
क्यों इस मुकाम पे पहुंचती इंसान की अपनी जंग,
आग लगाई किसने "मैंने या उसने", नुकसान हर वक्त तेरा ही रहा है इंसान...
कहीं कोई आग में तेल डालने पे तूला, कहीं कोई अपनी मंजिल पाने को बेताब, कहीं राजकीय पक्ष अपना वजूद बढ़ाने में मशगूल...
आदिकाल से चला आया ये युद्ध कब्ज़ा, हक़ अपना पाने को,कसर न छोड़ी तूने किसी भी हद तक जाने को...
अपने आप को बड़ा महान मान रहा अत्याधुनिक, तकनीकी शस्त्र बनाकर तु, कहीं खुद की तबाही का कारण न बन जाए तु...
कहीं युद्ध जीतने का जश्न होगा, कहीं तबाही का मंजर, दर्दनाक चीखें, खंडहर आशियाना...
क्यों दर्द नहीं समझता कोई मेरा "अपनों के खोने का, बिछड़ने का", आशियाना जो बनाया था ज़िन्दगी जीने का...
महसूस कर फक्र तु ए इंसान...
"शांति, सुकुन" कुदरत ने बखसा तूझे ईन हसीन नज़ारों में और तूने दिया विश्व को सन्नाटा, तबाही, बेचैनी हर दिल को इस चमन में...
गर्व महसूस कर "प्राकृतिक आपदाएं को जीत पाए तू अगर"
कोशिश मत कर ऐ इंसान" बदलने की रूख़ हवा का",जिसके कारण तू सांस ले रहा,पल रहा,
"कहीं खुद ही न हो जाए तबाह, हवा ने जोअपना रूख बदला"
"युद्ध" मेरी नज़र से...