कश्मीर की वादियों में
इन हसीन वादियों में खो जाने को मन करता है,
डर नहीं इन वादियों से जो जन्नत से कम नहीं...
ओढ़ी चादर बर्फ की निखरा रूप तेरा मनमोहक,
ठंड का कहर यूँ बरसा, काँप उठा तन मेरा...
सूरज की किरणों से पिघली ये वादियां,
मन पिघला मेरा आज मौसम ने जो ली अंगड़ाईयाँ...
अंबर छूने को बेताब ये पेड़, ख़त्म ना हो कभी ये वादियों का सफर...
घाटी बनी बेहद खूबसूरत, रंग बदला जो चिनार के पत्तो ने पतझड़ में...
ख़ामोशी, सन्नाटा कोई मायने नहीं रखता इन वादियों में,
कुदरत ने सजाया तुझे इस रंगरूप से, दिदार करते रहे हर पल तुझे...
रंग-बिरंगी फूलो ने, सेब के बागानों ने,
लूट लिया मन आज कश्मीर तेरी घाटीओ ने...
डल झील बनी मुकुट तेरा, शिकारा के अप्रितम सौंदर्य से सजा गहना तेरा...
ढली शाम निकले तारे, रंग बदला यूँ नज़ारो ने,
"है कोई चित्रकार मुझसा इस जहाँ में"...
नकाशी खूब बारीकी से सजी हर चीज़ में,
कुदरत ने भी तो नकाशा तुझे बारीकी से इस धरती पे...
मोहब्बत, मासुमियत, ख़ुशी इस तरह छाई चेहरे पे,
मानो सारी हसीन वादियां समेटी इस परिधान में...
लोहड़ी, बैसाखी, हेमिस, तुलिप, शिकारा जैसे कई त्योहारों ने चारचांद लगाए तेरे वजूद में,
दिल झूम उठा आज "चाम" "भांगड़ा" "डोगरी" "मंदजास" नृत्य के ताल पे...
हर तरफ हसीन वादियां फिर भी क्यों सहमा सा, एक खौफ में जी रहा इंसान??
ज़ख्म देने वाला भी तु और ज़ख्म पाने वाला भी तुजो ठहरा इंसान...
तस्वीरें देख तेरी, खो गया इन हसीन वादियों में,
ज़िक्र क्यों न हो हर आलम का, धरती का स्वर्ग जो तु ठहरा...
"कश्मीर की वादियों में"... मेरी नज़र से...















