"बारिश की बूंदे"
काले घने बादलों की छाई घटा,
बिजली के चमकने और
गरजने ने बांधा समा,
धरती से मिलन को आतुर हुई बूंदे....
कभी झरमर झरमर बरसती बूंदे,
कभी बौछार बनकर लहराती बूंदे,
कभी तेज बारिश के रूप में
"शोर" मचाती बूंदे,
कभी टिप टिप बरसती बूंदे....
कभी झरना बनके
खनन-खनन बहती बूंदे....
हर अंदाज में अलग अलग,
"जल तरंग" सुनाती बूंदे....
धरती में समाकर,
सौंधी सौंधी खुश्बू फैलाती बूंदे....
धरती की सतह से, सतही जल से,
टकराकर नृत्य करती बूंदे....
पेड़ पौधो के पत्तों और फूलों पे गिरकर,
"बून्द जो बन गई मोती"
सूरज की किरणों को परावर्तित कर,
आसमां को "इंद्रधनुष" से सजाती बूंदे....
गर्मी से त्रस्त हर जीव को,
सुकून पहुंचाती बूंदे....
धरती को हरी हरी,
हरियाली से सजाती बूंदे....
कभी बून्द बून्द को तरसाती,
कभी झूम झूम के बरसती बूंदे....
चल पड़ी वहाँ, जहाँ हवा का रुख,
बादल मुझे ले चला....
बह गई वहाँ, जहाँ नदी-झरना-सागर
मुझे ले चला....
कभी अपने ही बहाव में बह गई....
कभी अपने अलग अलग अंदाज से,
तन-मन को भिगोती बूंदे,
सावन की झड़ी जो बनी,
यौवन झूम उठा....
कागज की कश्ती जो बही मेरे बहाव में,
बचपन मुस्कुराया....
"मिल जाती थी सारी खुशियां,
बहाव में जिसके छोड़ कर,
मिलती नहीं वो खुशियां,
सारे जहाँ को पाकर"
दुखी मन ने पाया मुझमे
"अंसुवन की बूंदे"
सुखी मन प्रसन्न हुआ मुझसे....
सफर हुआ सुहाना आज,
"बारिश की बूंदे" जो गिरी....
मनीष।

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