भीगा रे मन मेरा आज
रिमझिम बरसता बारिश,
छम छम तरंग सुनाती बूंदो ने,
तन मन को भिगोया,
भीगा रे मन मेरा आज....
प्रकृति ने बदला रंग,
मिजाज मौसम का,
हरियाली छायी हर जगह...
चुबती जलती गर्मी,
उमस की जगह ली,
बरसाती ठंडे हवा के झोंके ने,
मिट्टी की सौंदी खुशबू ने....
तृप्त हुई धरा,
भीगा रे मन मेरा आज....
सूरज खेले आँख मिचोली,
काले घने बादलों संग,
बिजली चमके बादल गरजे,
इंद्रधनुष के रंगो से
सजा गगन....
भीगा रे मन मेरा आज....
मोर नाचे, टहूकार गूंजे वन में,
मेंढक की टर-टर ,
आवाज़ सुनाई दे जलभराव में...
किसान हुआ व्यस्त,
धान जोतने में ,
कुदरत ने जो भरोसा,
विश्वास जताया आज....
संचार हुई नयी ऊर्जा
हर जीव में....
भीगा रे मन मेरा आज....
बच्चों ने छोड़ी कागज की
कश्ती पानी में,
उम्र छोड़ बचपन ढूंढा
खयालों में आज....
वो.... रेनकोट पहनकर,
या छाता लेकर स्कूल जाना,
खुदसे ज्यादा किताबें,
दोस्त न भीगे उसकी फ़िक्र करना...
पानी में कूदकर छब छब करना,
तो कभी कीचड़ में फिसलना,
कभी छाते का उल्टा होना,
कहीं मशरूम खोजना ,
कभी ज्यादा बारिश गिरने से,
स्कूल में छुट्टी का इंतजार करना...
हरकतें जो आज लगती हमें,
कभी मासूम दिल की
चाहत हुआ करती थी....
बारिश में खोई दिल की हर आरज़ू ,
भीगा रे मन मेरा आज...




